लखीमपुर में बाघ हमले से किसान आक्रोशित: आठवीं बार हमले के बाद दुधवा गेट पर प्रदर्शन

लखीमपुर खीरी के दुधवा नेशनल पार्क क्षेत्र में बाघ के लगातार हमलों से आक्रोशित किसानों ने वन विभाग पर लापरवाही का आरोप लगाया है। किसानों ने दुधवा नेशनल पार्क के मुख्य गेट पर घेराव किया और मृत बछड़े को लेकर विरोध प्रदर्शन किया।

बाघ द्वारा आठवीं बार हमला – किसान आक्रोशित

मिली जानकारी के अनुसार यह घटना बुधवार रात करीब 10 बजे पलिया तहसील की ग्राम पंचायत बसंतापुर की बताई जा रही है। गांव निवासी इंद्रजीत गिल के फार्म से बाघ ने एक गाय के बछड़े को लगभग 100 मीटर दूर गन्ने के खेत में खींचकर मार डाला।

ग्रामीणों के शोर मचाने पर बाघ मौके से भाग गया।किसानों का दावा है कि यह अब तक आठवीं बार है जब इस क्षेत्र में बाघ ने हमला किया है, जिस पर किसान गुस्से में हैं और उन्होंने इसे गंभीर समस्या बताया है।

दुधवा गेट पर प्रदर्शन – वन विभाग पर आरोप

हमले के बाद किसान सड़क पर उतर आए और उन्होंने “दुधवा गेट” के सामने प्रदर्शन किया। उनका मुख्य आरोप है कि वन विभाग ने समय पर प्रभावी कदम नहीं उठाए — चाहे वह जवाबदेही हो, मॉनिटरिंग हो, या बफ़र-जोन में सुरक्षा बढ़ाना हो।ग्रामीणों ने तुरंत वन विभाग को घटना की जानकारी दी, लेकिन देर रात तक कोई अधिकारी मौके पर नहीं पहुंचा। इससे नाराज ग्रामीणों ने गुरुवार सुबह बछड़े का शव लेकर दुधवा मुख्यालय के गेट पर पहुंचकर विभागीय लापरवाही के खिलाफ कड़ा विरोध प्रदर्शन किया।

जगरूप सिंह, पवन चौधरी, परनीत सिंह, तलविन्दर सिंह और जसविन्दर चौधरी सहित अन्य ग्रामीणों ने बताया कि यह क्षेत्र में बाघ का लगातार आठवां हमला है। उनके अनुसार, अब तक कई पालतू पशु बाघ का शिकार बन चुके हैं। ग्रामीणों ने यह भी बताया कि गन्ने की छिलाई का मौसम होने के बावजूद बाघ के डर से किसान खेतों में जाने से कतरा रहे हैं।

किसानों की मांगे व आगे की चुनौतियाँ

ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि वन विभाग की उदासीनता के कारण क्षेत्र में बाघ का आतंक लगातार बढ़ रहा है। उनका कहना है कि सूचना देने के बावजूद मौके पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की जाती, जिससे ग्रामीणों में भारी आक्रोश है।किसानों ने मांग की है कि बाघ को जल्द पकड़ा जाए या हटाया जाए ताकि खेतों में काम सुरक्षित हो सके।

साथ ही मुआवजे की पारदर्शिता, बफर-क्षेत्र की सीमा तय करना और खेतों-जंगल के बीच बेहतर पटर्न तय करना जैसे सुझाव सामने आये हैं।चुनौती बनी हुई है कि जंगल-मानव सीमा नियंत्रण, निगरानी सिस्टम और जोखिम-क्षेत्रों में सुरक्षा व्यवस्था बेहतर हो।

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